हड़प्पा सभ्यता-हड़प्पा सभ्यता की खोज-हड़प्पा सभ्यता की प्रमुख विशेषता-हड़प्पा सभ्यता की मुहरें

हड़प्पा सभ्यता

हड़प्पा सभ्यता (Harrapan Civilisation) विश्व की सबसे प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में स एक प्रमुख सभ्यता है। नदी घाटी सभ्यताओं के अन्तर्गत जिस प्रकार मेसोपोटामिया, मिस्र तथा चीन की सभ्यताओं का विकास हआ. उसी तरह सिन्ध नदी की घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilisation) का विकास हुआ। सिन्ध नदी की घाटी में इस सभ्यता का जन्म होने के कारण इसे सिन्धु घाटी का सभ्यता अथवा सैन्धव सभ्यता भी कहते हैं। इस सभ्यता का नामकरण हड़प्पा नामक स्थान, जहाँ यह संस्कृति पहली बार खोजी गई थी, के नाम पर किया गया है। हड़प्पा इस सभ्यता का प्रमुख नगर था। यह सभ्यता लगभग 2500 ई. पू. विकसित हुई थी।

हड़प्पा सभ्यता की खोज(Discovery of Harappan Civilization)

इस सभ्यता का आभास सर्वप्रथम 19वीं शताब्दी में पुरातत्त्ववेत्ता कनिंघम को हुआ। व्यवस्थित रूप से वर्ष 1921 में सर जॉन मार्शल की अध्यक्षता में माधव स्वरूप वत्स और दयाराम साहनी ने पंजाब प्रान्त में स्थित माण्टगोमरी जिले में रावी नदी के तट पर स्थित हड़प्पा के टीले का उत्खनन किया। वर्ष 1922 में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो नामक स्थान पर खुदाई कराई। इस खुदाई में नगरों के भवन तथा अन्य अवशेष प्राप्त हुए, जिनसे यह पता चलता है कि हड़प्पा सभ्यता के लोग सभ्य एवं शान्तिपूर्वक जीवन व्यतीत करते थे।

हड़प्पा सभ्यता को जानने के स्रोत(Sources for knowing the Harappan Civilization)

हड़प्पा सभ्यता के मुख्य स्थलों (हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो) की खुदाई से अनेक अवशेष प्राप्त हुए हैं; जैसे- मकान, सड़कें, नालियाँ, स्नानागार, कुएँ, बर्तन, मूर्तियाँ, वस्त्र, आभूषण आदि, जिनसे उस समय के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक जीवन पर प्रकाश डाला जा सकता है।

हड़प्पा सभ्यता का विस्तार वर्ष(Harappan Civilization Expansion Years)

1946 तक हडप्पा सभ्यता का विस्तार केवल हड़प्पा व मोहनजोदड़ो तक ही माना जाता था, परन्तु परवर्ती समय के उत्खनन कार्यों ने हडप्पा सभ्यता के विस्तार को आगे तक बढ़ा दिया है। अब तक इस सभ्यता के 350 से अधिक केन्द्र प्राप्त हो चुके हैं। प्राचीन हडप्पा सभ्यता का विस्तार बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत के पंजाब, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश राज्यों तक माना गया है। इन क्षेत्रों के अन्तर्गत प्रमुख केन्द्र मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, चन्हूदड़ो, आमरी, लोथल, रोपड़, कालीबंगा. कोटदीजी कवेटा (पाकिस्तान), आलमगीरपुर (मेरठ) आदि थे। यह सभ्यता उत्तर में कश्मीर के माण्डा से दक्षिण में महाराष्ट्र के दैमाबाद तथा पश्चिम में बलूचिस्तान के सुत्कागेण्डोर से पूर्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आलमगीरपुर (मेरठ) तक फैली थी।

नोट . हडप्पा और मोहनजोदड़ो इस सभ्यता के प्रमुख नगर थे।

मोहनजोदडो से खुदाई में सात सतहों वाला एक टीला प्राप्त हुआ, जिसे ‘मृतकों का टीला’ कहा जाता है। इसे देखकर यह अनुमान लगाया जाता है कि यह नगर सात बार उजड़ा और बसा होगा।

हड़प्पा सभ्यता के निर्माता(builder of harappan civilization)

हड़प्पा सभ्यता के निर्माताओं को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं। कुछ ने भारत के मूल निवासी द्रविड़ों को निर्माता माना है, तो कुछ ने आर्यों के सहयोग को स्वीकार किया है, परन्तु कुछ विद्वानों ने द्रविड़ों व आर्यों दोनों को निर्माणकर्ता बताया है। ‘असुर’ लोगों को भी इस सभ्यता का निर्माता कहा गया, किन्तु अधिकांश विद्वानों ने द्रविड़ों को सिन्धु घाटी सभ्यता का निर्माता माना है।

खुदाई से प्राप्त मानव अस्थि-पंजर इत्यादि से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ विभिन्न जातियों के लोग निवास करते थे, इसलिए कहा जा सकता है कि इस सभ्यता का सम्बन्ध विभिन्न नस्लों के व्यक्तियों से रहा होगा।

हड़प्पा सभ्यता का काल (Harappan Civilization Period)

सर जॉन मार्शल का मानना है कि हड़प्पा सभ्यता का विकास 4000 से 2500 ई.पू. में हुआ। अभी तक हड़प्पावासियों की लिपि को पढ़ा नहीं जा सका है। इसी कारण इस सभ्यता की अवधि का ठीक तरह से कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। आर के मुखर्जी ने इस सभ्यता का काल 3250-2750 ई. पू. के मध्य माना है, लेकिन डॉ. राधाकृष्णन ने इसे 3500-2500 ई. पू. के मध्य माना है। एक अन्य विद्वान मार्टिमर ह्वीलर ने सिन्धु सभ्यता का काल 2500-1500 ई. पू. निर्धारित माना है।

हड़प्पा सभ्यता की प्रमुख विशेषता (Salient Features of Harappan Civilization)

हड़प्पा सभ्यता भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता मानी जाती है। उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं के आधार पर इस सभ्यता के नगर नियोजन, सार्वजनिक जीवन, भवन निर्माण, आर्थिक दशा, धार्मिक विश्वासों तथा कलाओं के ज्ञान आदि का अनुमान लगाया गया है। इस सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. नगर योजना(1. Town Planning)

हड़प्पा सभ्यता के लोगों की नगर योजना उत्तम कोटि की थी। यहाँ के नगर एक निश्चित योजना के आधार पर बने थे। नगर के अन्दर सुव्यवस्थित मोहल्ले होते थे। नगरों की सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। ये पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण की ओर बनाई जाती थीं।

हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना की विशेषताएं निम्नलिखित थी

( i )भवन निर्माण मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिला सबसे बड़ा भवन 70.1 मी लम्बा तथा 23.77 मी चौड़ा है। अनुमान लगाया जाता है कि यह भवन किसी उच्चवर्गीय परिवार का निवास स्थान रहा होगा। इस काल में तीन प्रकार के भवन होते थे-रहने के आवास या घर, पूजागृह या सार्वजनिक भवन तथा विशाल स्नानागार।

मकान दो या तीन मंजिल तक के होते थे तथा वायु और प्रकाश के आने के लिए पर्याप्त खिड़कियाँ और रोशनदान भी होते थे। मकान बनाने में ईंटों का प्रयोग किया जाता था।

इन ईंटों की लम्बाई, चौड़ाई तथा मोटाई का अनुपात क्रमशः 4:2:1 होता था। चिनाई के लिए सुरखी, गारा तथा चूने का प्रयोग होता था। प्रत्येक मकान में कमरे, रसोईघर, स्नानागार और शौचगृह इत्यादि अलग-अलग बने होते थे।

(ii) विशाल स्नानागार मोहनजोदड़ो की खुदाई से एक विशाल स्नानागार के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इस स्नानागार की लम्बाई 55 मी तथा चौड़ाई 33 मी थी। इस स्नानागार के बीच में एक तालाब बना था, जिसकी लम्बाई 12 मी, चौड़ाई 7 मी तथा गहराई 2-1/2 मी. थी।

इस स्नानागार के पास एक कुआँ था, जिसका प्रयोग स्नानागार में नहाने के लिए किया जाता था।

स्नानागार में नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी थीं। गन्दे पानी को बाहर निकालने की भी उचित व्यवस्था थी। इस स्नानागार की दक्षिण-पश्चिम दिशा में आठ और स्नानागार बने हुए थे। कुछ विद्वानों ने ऐसा अनुमान लगाया कि यहाँ के लोग धार्मिक अवसरों पर ही स्नानागार का प्रयोग नहाने के लिए किया करते थे।

(iii) सार्वजनिक भवन स्नानागार के निकट ही एक अन्य भवन का प्रमाण मिला है, जो लगभग 27 मी लम्बा व 27 मी चौड़ा था। इसकी छत 20 स्तम्भों के ऊपर टिकी हुई थी, जिसमें एक विशाल हॉल 51.5 मी लम्बा एवं 41.14 मी चौड़ा संग्रहालय विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ये सार्वजनिक भवन शासन के विशेष कार्य के लिए उपयोग में लाए जाते थे।

(iv) जल निकासी खुदाई से पता चलता है कि नगरों में नालियों की उचित व्यवस्था थी, जिनका उपयोग नगर से गन्दा पानी निकालने के लिए किया जाता था। ये नालियाँ पक्की ईंटों की बनी होती थीं। तथा ढकी हुई होती थीं। घरों के बाहर छोटी-छोटी नालियाँ बनी होती थीं, जो नगर के बाहर जाकर बड़ी-बड़ी नालियों में मिल जाती थी और घर तथा नगर के गन्दे पानी को नगर के बाहर । पहुँचा देती थीं।

(V) विशाल अन्नागार स्नानागार के पश्चिम में 1.52 मी ऊँचे चबूतरे पर निर्मित एक भवन मिला है, जो पूर्व से पश्चिम में 45.72 मी लम्बा तथा उत्तर से दक्षिण में 22.86 मी चौड़ा है। इसे हीलर ने अन्नागार के रूप में वर्णित किया है। इसमें ईटो के बने हुए विभिन्न आकार के 27 प्रकोष्ठ प्राप्त हुए हैं। अन्नागार में हवा जाने के लिए स्थान बनाए गए थे। उसके उत्तर की ओर एक चबूतरा है, जो अन्न रखने तथा निकालने के समय उपयोग में लाया जाता था। अन्नागार की संरचना उच्च कोटि की थी। विद्वानों का विचार था कि यह राजकीय भण्डारागार था।

2. सामाजिक जीवन(social life)

हड़प्पा सभ्यता के सामाजिक जीवन की विशेषताएँ निम्नलिखित थी।

(i) समाज हड़प्पा सभ्यता में परिवार, समाज की मूल इकाई था और परिवार मातृसत्तात्मक होते थे। व्यवसाय के आधार पर समाज को चार श्रेणियों में बाँटा गया था—विद्वान् (पुरोहित, वैद्य, ज्योतिष), प्रशासनिक अधिकारी (योद्धा, सामन्त), व्यवसायी (व्यापारी, शिल्पकार) तथा श्रमजीवी (किसान व मजदूर)।

(ii) खान-पान हड़प्पावासियों द्वारा शाकाहारी व मांसाहारी दोनो प्रकार का भोजन प्रयोग किया जाता था। वे अपने खाने में गेहूँ, जौ व चावल इत्यादि का प्रयोग करते थे तथा नींबू, खरबूजा, तरबूज, दूध, दही आदि का भी उपयोग करते थे। मांसाहारी लोग मछली. भेड़, सुअर तथा मुर्गे आदि का मांस खाते थे।

(iii) वेशभूषा खुदाई से प्राप्त तकलियों के आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि हड़प्पावासी सूती व ऊनी कपड़ा बनाना तथा उसका उपयोग करना जानते थे। अधिकतर पुरुष धोती पहनते थे और कन्धों पर शॉल डाले रहते थे। स्त्रियाँ घाघरा व सिर पर एक पंख की तरह का वस्त्र धारण करती थीं।

(iv) आभूषण स्त्रियाँ एवं पुरुष दोनों ही आभूषण पहनते थे। जहाँ एक ओर धनी वर्ग के लोग सोने-चाँदी और बहुमूल्य पत्थरों के आभूषण पहनते थे, तो वहीं दूसरी ओर निर्धन वर्ग के लोग ताँबे व हड्डियों से बने आभूषण पहनते थे। पाँव में भी कड़े पहनने का चलन था। खुदाई से अनेक प्रकार के आभूषण प्राप्त हुए हैं, जिनमें चूड़ियाँ, सोने के हार, कड़े, करधनी, पायल, नथ तथा अंगूठियाँ आदि प्रमुख थे।

(v) श्रृंगार स्त्रियाँ एवं पुरुष दोनों ही शृंगारप्रिय थे। स्त्रियाँ बालों को विभिन्न प्रकार से सँवारती थीं और कॉस्य-दर्पण, सुगन्धित तेल, सुरमा, सुखर्जी और हाथीदाँत से बनी कंघी का प्रयोग करती थीं। पुरुष भी केश, मूंछे आदि को सँवारने पर विशेष ध्यान देते थे।

(vi) मनोरंजन के साधन मनोरंजन के लिए हड़प्पावासी मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु-पक्षियों को आपस में लड़ाना, चौपड़ और पासा खेलना आदि साधनों का प्रयोग करते थे। खुदाई से प्राप्त मुहरों से पता चलता है कि उस समय जुआ खेलने का भी चलन था। आधुनिक शतरंज से मिलता-जुलता भी एक खेल होता था। बच्चों के खेलने के लिए पत्थर, हाथीदाँत, मिट्टी, ताँबे से बने खिलौने, सीटियाँ, बैलगाड़ियाँ, झुनझुने इत्यादि का चलन था।

(vii) स्त्रियों की दशा सिन्धु सभ्यता में स्त्रियों को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। वे धार्मिक व सामाजिक उत्सवों तथा त्योहारों में भाग लेती थीं। पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था, परन्तु उनका मुख्य कार्य गृहस्थ कार्यों का सम्पादन करना था।

(viii) चिकित्सा प्रणाली सैन्धव जन रोगों से छुटकारा पाने हेतु अनेक औषधियों का ज्ञान रखते थे। ये लोग नीम, मूंगा, मछली की हड्डियाँ, हिरण के सींग आदि से विभिन्न प्रकार के रोगों का उपचार करते थे। ये शिलाजीत का मुख्य रूप से प्रयोग करते थे।

3. आर्थिक जीवन(economic life)

इस सभ्यता के आर्थिक जीवन की विशेषताएँ निम्नलिखित थी ।

(i) कृषि हड़प्पाकालीन अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्वपूर्ण स्थान था। इसी कारण हड़प्पाकालीन लोगों का आर्थिक जीवन सम्पन्न तथा वैभवपर्ण था। वे चावल. जौ, मटर तथा कपास आदि की खेती किया करते थे। कालीबंगा से एक जुते हुए खेत का भी प्रमाण मिला है। कपास की खेती सर्वप्रथम हड़प्पावासियों ने की थी।

(ii) पशुपालन हड़प्पावासी पशुपालन भी किया करते थे। वे गाय, बैल, भैंस, भेड. कुत्ता, सुअर, बकरी आदि पशुओं का पालन किया करते थे। इस सभ्यता के लोग कूबड़दार बैल को पवित्र मानते थे। उन्हें घोड़े तथा ऊँट का ज्ञान नहीं था।

(iii) उद्योग-धन्धे हड़प्पा सभ्यता में वस्त्र बुनना, आभूषण बनाना और मिट्टी के बर्तन बनाना आदि उद्योग-धन्धे विकसित थे। मिट्टी के बर्तन (मृदभाण्ड) लाल रंग से रंगे होते थे। कुछ पर काले रंग की चित्रकारी भी की गई है।

(iv) व्यापार हड़प्पा सभ्यता में व्यापार उन्नत अवस्था में होने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार भी था। सारगोनयुगीन लेखों से भी मेसोपोटामिया एवं हड़प्पा सभ्यता के बीच व्यापारिक सम्बन्धों का विवरण मिलता है। विदेशों से व्यापार होता था। व्यापार जल व थल दोनों मार्गों से होता था। वस्तुएँ तोलने के लिए तराजू और बट्टों का प्रयोग किया जाता था। लोथल और सुत्कागेण्डोर (बन्दरगाह) इस सभ्यता के प्रमुख व्यापारिक केन्द्र थे। व्यापार सिक्कों द्वारा होता था तथा परिवहन के साधनों में नौकाएँ, छोटे जहाज, बैलगाड़ियाँ, पशु आदि प्रयोग किए जाते थे।

(v) कुटीर उद्योग हड़प्पावासी छोटे-छोटे व्यवसायों में निपुण थे, जिनमें काँसा, पीतल तथा मिट्टी के बर्तन, खिलौने बनाना, रूई कातना, वस्त्र बनना, ईंटें बनाना, मकान बनाना व आभूषण बनाना आदि प्रमुख थे।

4. धार्मिक जीवन(religious life)

हड़प्पा सभ्यता की धार्मिक विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

(i) शिव की पूजा हड़प्पावासी मूर्ति पूजक थे। मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त मूर्तियों व मुहरों पर पशुपति शिव की मूर्ति अंकित है, जिसके दाईं ओर चीता और हाथी तथा बाईं ओर गैंडा और भैसा उत्कीर्ण हैं। आसन के नीचे दो हिरण बैठे हुए हैं। सिर पर त्रिशुल जैसा आभूषण है। इससे पशुपति शिव की पूजा के प्रचलन का पता चलता है।

(ii) मातृशक्ति की पूजा सिन्धु घाटी के लोग मातृशक्ति में भी विश्वास करते थे। हड़प्पा की खुदाई में स्त्री की मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं, जिन्हें सर जॉन मार्शल ने मातृदेवी कहा है। हिन्दू धर्म में इसे शक्ति रूप में पूजा जाता था।

(iii) लिंग व योनि पूजा सिन्धु घाटी सभ्यता में लिग व योनि पूजा की जाती थी। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सिन्धवासी प्रकृति की प्रजनन शक्ति की उपासना करते होंगे। शिवलिंग की पूजा हिन्द धर्म की पूजा पद्धति की ओर संकेत देती है।

(iv) पशु पूजा खुदाई में प्राप्त हुई मूर्तियों व ताबीज़ों पर अंकित पशुओं के चित्रों से पता चलता है कि हड़प्पावासी पशुओं की भी पूजा करते थे। कूबड़वाला बैल और शृंगयुक्त पशु पवित्र पश थे। इनके अतिरिक्त बिल्ली, चीता आदि की भी पूजा की जाती थी। कुछ मुहरों पर प्राप्त हए नाग के चित्रों से नाग पूजा का अनुमान लगाया जाता है।

(v) अन्धविश्वास हड़प्पावासी अन्धविश्वास व जादू-टोनों पर भी विश्वास रखते थे। खुदाई से प्राप्त हुए ताबीज़, माला व सिक्के इस बात का संकेत देते हैं। इन सबके अतिरिक्त हड़प्पावासी किसी एक धर्म के अनुयायी न होकर मिश्रित धर्मों के अनुयायी थे। सूर्य पूजा, वृक्ष पूजा आदि भी की जाती थी। हड़प्पावासी पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे। देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए नृत्य-संगीत का प्रचलन था।

(vi) मृतक संस्कार हड़प्पा की खुदाई में प्राप्त हुए अस्थि-पंजर तथा अस्थियों व भस्मों के कलशों से यह अनुमान लगाया जाता है कि हड़प्पावासी निम्न तीन विधियों द्वारा मृतक का अन्तिम संस्कार करते थे।

  •  मृतक को जमीन में दफनाया जाता था। .
  •  मृतक को जंगल में पशु-पक्षियों के भोजन हेतु खुला छोड़ दिया जाता था।
  •  मृतक को जलाकर उसकी हड्डियों व राख को एक घड़े में रखकर जमीनमें दफनाया जाता था।

5. राजनीतिक जीवन(political life)

इस सभ्यता की राजनीतिक जीवन सम्बन्धी विशेषताएँ निम्नलिखित थीं।

(i)शासन व्यवस्था हड़प्पा काल के राजनीतिक जीवन के बारे में कुछ कहना या अनुमान लगाना बहुत कठिन है। उस समय में कोई शासक या राजा रहा होगा, इस बारे में कोई प्रमाण नहीं मिला है। । कछ विद्वान यहाँ लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था को मानते हैं, तो कुछ यहाँ परोहित वर्ग के शासन को मानते हैं। सिन्धुवासी आखेटक व युद्धप्रिय थे. परन्तु इसके अतिरिक्त सिन्धुवासियों का राजनीतिक जीवन शान्तिपूर्ण था। विशाल अन्नागारों से पता चलता है कि कर का भुगतान अनाज के रूप में जाता था और उसे गोदामों में रखा जाता था। भूमि कर आय का प्रमख साधन था।

(ii) अस्त्र-शस्त्र हड़प्पावासी लोहे के ज्ञान से अनभिज्ञ थे। वे शान्तिप्रिय थे. फिर भी उन्होंने अपनी रक्षा के लिए हड्डी, पत्थर तथा तांबे व कासे से कुल्हाड़ी, तीर-कमान आदि अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया।

6. कला(Art)

हड़प्पा सभ्यता की कला सम्बन्धी विशेषताएं निम्नलिखित थीं

मूर्तिकला हड़प्पावासी मूर्तिकला में दक्ष थे, इसका प्रमाण खुदाई से प्राप्त मनुष्यों तथा पशुओं की मूर्तियों से मिलता है। ये मूर्तियाँ मिट्टी, पत्थर तथा 4 पकी मिट्टी से बना वृषभ काँसे से बनाई जाती थीं और रंग द्वारा रंगी जाती थीं।

(ii) चित्रकला हडप्पा सभ्यता में बर्तनों व मुद्राओं पर चित्रकारी करने का प्रचलन था। इस काल में भवनों एवं दीवारों पर बेल-बूटे.पशु-पक्षी तथा पेड़-पत्तियों के चित्र बनाए जाते थे।

(iii) वास्तुकला सिन्धुवासी वास्तुकला में अत्यन्त निपुण थे। भवन निर्माण की कला से पता चलता है कि वे भवनों का निर्माण दिशाओं के अनुसार करते थे।

(iv) धातु कला सिन्धुवासी सोने-चाँदी, काँसा, ताँबा आदि धातुओं से मूर्तियाँ व आभूषण बनाना जानते थे।

(v) संगीत व नृत्यकला खुदाई से संगीत के वाद्य यन्त्र भी प्राप्त हए हैं। हड़प्पा सभ्यता के काल में संगीत व नृत्यकला अपनी चरम-सीमा पर थी, इसका उदाहरण हमें नृत्य करती हुई नर्तकी की कॉस्य मूर्ति से मिलता है, जो मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त हुई थी।

(vi) मुहर निर्माण कला हड़प्पा सभ्यता के क्षेत्रों की खुदाई से लगभग 5,000 मुहरें प्राप्त हुई हैं, जो लाख, पत्थर तथा चमड़े इत्यादि से बनी हुई हैं। बहुत-सी मुहरों पर साँड़, हाथी, बारहसिंगा आदि पशुओं के चित्र मोहनजोदड़ो की मुहर अंकित हैं।

(vii) बर्तन निर्माण कला हड़प्पावासी बर्तन और खिलौने बनाने की कला में प्रवीण थे। चाक से निर्मित इन बर्तनों पर पॉलिश की जाती थी और चित्रकारी द्वारा सजाया जाता था।

(viii) लेखन कला इस सभ्यता के लोग लेखन कला से परिचित थे। सिन्धु लिपि चित्राक्षर लिपी है, जिसमें चित्रों के माध्यम से सम्प्रेषण (Communication) किया गया है। खुदाई से प्राप्त मुहरों पर कुछ लिखा हुआ है, जिससे यह पता चलता है कि हडप्पा सभ्यता के लोग। शिक्षित थे, परन्तु सिन्धु सभ्यता की लिपि को आज तक पढ़ा नहीं जा सका है। इसमें 60 मूल चिह्न तथा 400 वर्ण अथवा अक्षर हैं। ये दाइ से बाईं ओर लिखे गए हैं।

हड़प्पा सभ्यता का अन्त/पतन ( End/fall of Harappan Civilization)

हड़प्पा सभ्यता के पतन का प्रारम्भ 1900 – 1700 ई. पू. में होने लगा था। हड़प्पा संस्कृति का अन्त क्यों और कैसे हुआ, इसका कोई तथ्यात्मक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, परन्तु इतिहासकारों के अनुमानों के आधार पर हड़प्पा सभ्यता के हास के कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

1 भूकम्प लोगों की अस्थियों का गलियों, सीढ़ियों तथा कुओं में पाया जाना एवं घरों की दीवारों में दरारों का पाया जाना इस ओर संकेत करता है कि सम्भवत: हड़प्पा संस्कृति का अन्त भूकम्प द्वारा हुआ होगा।

2. बाढ़ हड़प्पा सभ्यता का विकास सिन्धु नदी घाटी में हुआ था और सिन्धु नदी में यदा-कदा बाद भी आती रहती थी। अत: ऐसा अनुमान भी लगाया जाता है कि इस सभ्यता का अन्त बाद द्वारा हुआ होगा।

3. आपदाएँ कुछ इतिहासकारों का मत यह भी है कि जनसंख्या वृद्धि, गृह युद्ध, महामारी, अकाल आदि प्राकृतिक आपदाएँ भी हड़प्पा सभ्यता के अन्त का कारण हो सकती हैं।

4. भूमि विघटन नदियाँ समय-समय पर अपना मार्ग बदलती रहती हैं, तो इस कारण से यह भी प्रबल सम्भावना है कि सिन्धु नदी ने अपना मार्ग परिवर्तित कर लिया हो, जिससे वहाँ की कृषि योग्य भूमि नष्ट हो गई हो, जिसके परिणामस्वरूप लोग वहाँ से पलायन कर गए हों और सिन्धु सभ्यता का अन्त हो गया हो।

5. बाह्य आक्रमण कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सम्भवत: आर्यों के आक्रमण द्वारा इस सुन्दर और विकसित सभ्यता का अन्त हुआ होगा, क्योंकि यहाँ लोग झगड़ालू प्रवृत्ति के नहीं थे, इसलिए किसी बाह्य आक्रमणकारी ने यहाँ आक्रमण कर दिया हो और इस सभ्यता का अन्त हो गया हो।

अत: इस आधार पर कहा जा सकता है कि ये सभी कारण केवल सम्भावनाओं के आधार ही हैं। किसी भी कारण का कोई भी तथ्यात्मक ठोस प्रमाण नहीं है।

हड़प्पा  सभ्यता की विश्व को देन(Harappan Civilization’s Contribution to the World_

हड़प्पा सभ्यता की विश्व को देन निम्नलिखित हैं

1. नगर योजना सिन्धु सभ्यता ने आधुनिक विश्व को नगर योजना उपलब्ध कराई।

2. बाँध निर्माण बाढ़ों से बचने के लिए पत्थर तथा ईंटों के बाँध इसी सभ्यता के लोगों ने सर्वप्रथम बनाए थे।

3. मिट्टी के बर्तन मिट्टी के बर्तन बनाने की कला का भी विकास – सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों ने किया।

4. जल निकासी जल निकासी की सुव्यवस्था भी इस सभ्यता की देन है।

5. कपास की खेती सिन्धुवासियों ने सर्वप्रथम कपास का उत्पादन आरम्भ किया।

• हड़प्पा सभ्यता इस सभ्यता को सिन्धु घाटी सभ्यता अथवा सैन्धव सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। यह सभ्यता लगभग 2500 ई. पू. विकसित हुई थी।

• मृतकों का टीला सिन्धु सभ्यता के स्थल मोहनजोदड़ो से खुदाई में सात सतहों वाला एक टीला प्राप्त हुआ था, जिसे मृतकों का टीला कहा जाता है।

• हड़प्पा सभ्यता के स्थल इस सभ्यता के स्थल-हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो की खुदाई से अनेक अवशेष प्राप्त जैसे-मकान, सडकें नालियाँ, स्नानागार, बर्तन, दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, आभूषण इत्यादि, जिनसे उस समय के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक जीवन का पता चलता है।

• स्नानागार मोहनजोदडो से मिले विशाल स्नानागार का प्रयोग लोग धार्मिक अवसरों पर नहाने के लिए करते थे।

•  कपास कपास को सर्वप्रथम हड़प्पावासियों ने ही पैदा किया था

• मनोरंजन के साधन मनोरंजन के लिए हड़प्पावासी मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु-पक्षियों को आपस में लड़ाना, चौपड़ और पासा खेलना आदि। साधनों का प्रयोग करते थे।

• हड़प्पा सभ्यता का अन्त इस सभ्यता का अन्त सम्भवत: भूकम्प, बाढ़, आपदाएँ, भूमि विघटन, बाह्य आक्रमण इत्यादि कारणों से हुआ था।

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